
जी नहीं, मैं फिल्म का कोई गाना नहीं लिख रही हूं। वैसे क्या आपने कभी बादल को दीवाना होते हुए देखा है। अब सब ये सोचेंगे कि भला बादल भी कभी दीवाना होता है। पर ये सच है। अगर आपने नहीं देखा है तो इसमें आपकी कोई गलती भी नहीं है। क्योंकि तथाकथित महानगरों में आप बादल को दीवाना होते देख भी नहीं सकते हैं। कारण साफ है यहां साफ, नीला चमकता आसमान दिखाई दे तब न।
नीला आसमान कहते ही नैनीताल की याद आती है। यकीन मानिए चटख नीले आसमान पर बादलों को घेरे किसी परिलोक जैसे ही लगते हैं। जाड़ों के दिनों में छत पर हम लोग रोजाना ही धूप का मजा लेते थे। जाड़े की गुनगुनी धूप का मजा ही कुछ होता है। छत पर बैठे-बैठे जब थक जाते थे तो वहीं पर लेट भी जाते थे। लेटते ही नजर बस आसमान की ओर। कहीं पर एकदम नीला आसमान तो कहीं पर सफेद रूई जैसे छोटे-छोटे बादल तो कहीं पर डरावने काले बादल। गौर से देखने पर पता चलता कि काला बादल आसमान के फैले आंगन में खेल रहे नन्हे से खरगोश जैसे सफेद बादल को निगलने के लिए अपने कदम बढ़ा रहा है। मैं ये सोचती की अब क्या होगा। क्या ये राक्षस इस नन्हें-मुन्हें बच्चे को निगल जाएगा। तभी दूर से सफेद बादलों का बड़ा सा झुंड उस हंसते खेलते बादल को बचा लेता। जब ऐसा होता तो मन खुशी से भर उठता। हालांकि हर नन्हें खरगोश जैसे बादल की किस्मत ऐसी नहीं होती कि उसे कोई बचा ले। कई बार काले बादल छोटे बादल को अपने गहरे रंग में इस तरह डुबो लेते कि उसका अस्तित्व ही खत्म हो जाता।
वैसे ऐसा नहीं है कई बार दो छोटे-छोटे बादल अपने बड़े से झुंड को छोड़कर एक दूसरे के साथ खेलने लगते। उन्हें किसी बंधन, जाति, मर्यादा या बेडि़यों की फिक्र नहीं होती और जब तक बादलों की टोली उन्हें लेने के लिए आती तब तक वो दोनों नन्हें बादल एक होकर काफी दूर निकल जाते।