Monday, March 31, 2008

महंगाई मार गई...

पहले कहा जाता था कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुन गाओ. लेकिन दिन ब दिन आस्मान छूते दाल के भाव ने आम लोगों का जीना मुहाल कर रखा है. हर आदमी मंहगाई कि मार से बदहाल है. जो मोटा चावल ८ रुपए किलो बिक रहा था, उसका दाम अब १२-१४ रुपए किलो हो गया है. यानी कि दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं. गेहूं का निर्यात करने वाला हमारा देश आयात करने पर मजबूर है. ये सब खेती के प्रति उदासीन रव्वये का ही परिणाम है. यदि समय रहते कृषि कि तरफ़ ध्यान नहीं दिया गया तो वो दिन दूर नहीं जब महंगाई के अलावा भी कई ढेर सारी समस्यायें मुह बाए खड़ी हो जायेंगे.जिसकी शुरुआत हो चुकी है. अभी तो बस रोटी, कपड़ा और मकान फ़िल्म का गाना याद आ रहा है, महंगाई मार गई...महंगाई मार गई...

Saturday, March 29, 2008

हैवानियत

पटना के गाँव नौबतपुर कि लाल परी के साथ जो कुछ भी हुआ वो इंसानियत का घिनोना चेहरा नहीं तो और क्या है. जब किसी को किसी देवता का खौफ नहीं होता तो एक आम महिला को डायन बनाने में गर्व क्यों महसूस होता है. और उसके बालों को काटकर कहते हैं कि ऐसा करने से ऐसे महिला के ऊपर से दुश्प्रवार्तियाँ चली जाती हैं. यानि कि बाल से लेकर नाखून तक सबको ऐसा पाठ पढाओ कि दुबारा डायन क्या डायन कि माँ भी आने से घबराए. ये है हमारे तताकथित सभ्य समाज की हकीक़त. वैसे ये घटना है तो गाँव की लेकिन आधुनिकता, खुलेपन और साक्षरता के दावे करने वाली संस्थाओं और ऐन्ज्यो के मुहं पर ये करारा चाट्टा ही तो है. ये कोई पहली घटना नहीं है. बिहार में पिछले १५ सालों में अब तक कुल २५०० महिलाओं को डायन बताकर मारा डाला गया है. महिला शशक्तिकरण के महीने में हुई ये घटना हमे याद दिलाती है कि मंजिल अभी दूर है.

Friday, March 28, 2008

नई शुरुआत

पहले भी एक बार ब्लॉग बना चुकी हूँ लेकिन लगातार नहीं लिख पाई. कभी समय की वजह से तो कभी अपने आलस्य के कारन. लेकिन न लिख पाने की टीस हमेशा ही रहती थे . यहाँ ये बता दूँ की मैंने भले हे न लिखा हो पर ब्लॉग में लिखी गए सामग्री को उसी तरह पढ़ती थे जैसे रोज़ अखबार को पढ़ा जाता है. बस अब मैंने भी ठान लिया कि चाहे जो कुछ भी हो जाए अब ब्लॉग की दुनिया से जाना नहीं है, क्यूंकि अपने मन की बात कहने का इससे अच्छा जरिया और क्या हो सकता है. वो कहते हैंन देर आए दुरुस्त आए .आशा है सभी ब्लोग्गेर्स का स्नेह और सहयोग मिलता रहेगा.