Monday, March 31, 2008

महंगाई मार गई...

पहले कहा जाता था कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुन गाओ. लेकिन दिन ब दिन आस्मान छूते दाल के भाव ने आम लोगों का जीना मुहाल कर रखा है. हर आदमी मंहगाई कि मार से बदहाल है. जो मोटा चावल ८ रुपए किलो बिक रहा था, उसका दाम अब १२-१४ रुपए किलो हो गया है. यानी कि दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं. गेहूं का निर्यात करने वाला हमारा देश आयात करने पर मजबूर है. ये सब खेती के प्रति उदासीन रव्वये का ही परिणाम है. यदि समय रहते कृषि कि तरफ़ ध्यान नहीं दिया गया तो वो दिन दूर नहीं जब महंगाई के अलावा भी कई ढेर सारी समस्यायें मुह बाए खड़ी हो जायेंगे.जिसकी शुरुआत हो चुकी है. अभी तो बस रोटी, कपड़ा और मकान फ़िल्म का गाना याद आ रहा है, महंगाई मार गई...महंगाई मार गई...

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