Thursday, July 31, 2008

दीवाना हुआ बादल


जी नहीं, मैं फिल्‍म का कोई गाना नहीं लिख रही हूं। वैसे क्‍या आपने कभी बादल को दीवाना होते हुए देखा है। अब सब ये सोचेंगे कि भला बादल भी कभी दीवाना होता है। पर ये सच है। अगर आपने नहीं देखा है तो इसमें आपकी कोई गलती भी नहीं है। क्‍योंकि तथाकथित महानगरों में आप बादल को दीवाना होते देख भी नहीं सकते हैं। कारण साफ है यहां साफ, नीला चमकता आसमान दिखाई दे तब न।

नीला आसमान कहते ही नैनीताल की याद आती है। यकीन मानिए चटख नीले आसमान पर बादलों को घेरे किसी परिलोक जैसे ही लगते हैं। जाड़ों के दिनों में छत पर हम लोग रोजाना ही धूप का मजा लेते थे। जाड़े की गुनगुनी धूप का मजा ही कुछ होता है। छत पर बैठे-बैठे जब थक जाते थे तो वहीं पर लेट भी जाते थे। लेटते ही नजर बस आसमान की ओर। कहीं पर एकदम नीला आसमान तो कहीं पर सफेद रूई जैसे छोटे-छोटे बादल तो कहीं पर डरावने काले बादल। गौर से देखने पर पता चलता कि काला बादल आसमान के फैले आंगन में खेल रहे नन्‍हे से खरगोश जैसे सफेद बादल को निगलने के लिए अपने कदम बढ़ा रहा है। मैं ये सोचती की अब क्‍या होगा। क्‍या ये राक्षस इस नन्‍हें-मुन्‍हें बच्‍चे को निगल जाएगा। तभी दूर से सफेद बादलों का बड़ा सा झुंड उस हंसते खेलते बादल को बचा लेता। जब ऐसा होता तो मन खुशी से भर उठता। हालांकि हर नन्‍हें खरगोश जैसे बादल की किस्‍मत ऐसी नहीं होती कि उसे कोई बचा ले। कई बार काले बादल छोटे बादल को अपने गहरे रंग में इस तरह डुबो लेते कि उसका अस्तित्‍व ही खत्‍म हो जाता।

वैसे ऐसा नहीं है कई बार दो छोटे-छोटे बादल अपने बड़े से झुंड को छोड़कर एक दूसरे के साथ खेलने लगते। उन्‍हें किसी बंधन, जाति, मर्यादा या बेडि़यों की फिक्र नहीं होती और जब तक बादलों की टोली उन्‍हें लेने के लिए आती तब तक वो दोनों नन्‍हें बादल एक होकर काफी दूर निकल जाते।

Tuesday, June 24, 2008


परांठे वाली गली

वैसे आजकल न्‍यूज चैनलों में खाना खजाना जैसे ढ़ेर सारे कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं। लेकिन ऊपर दिए गए शीर्षक से मेरा ऐसा कुछ करने का इरादा नहीं है। वो तो बस ऐसी ही कॉलेज के दिनों की याद आ गई। जब कभी भी मेरा और मेरे साथियों का नोएडा से दिल्‍ली जाना हुआ करता था तो हम बस परांठे वाली गली की ओर बरबस ही खींचे चले जाते थे। वैसे मुझे यहां पर परांठे वाली गली के बारे में बताने की जरूरत नहीं है। भला, दिल्‍ली के मशहूर चांदनी चौक की मशहूर परांठे वाली गली को कौन नहीं जानता। इस गली की छोटी-छोटी दुकानों में कई तरह के परांठों को घी में सेंके जाने की खुश्‍बू और साथ में दो तीन तरह की सब्‍जी और केले की चटनी के जायकेदार स्‍वाद को कम से कम दिल्‍ली के बाशिंदे और मुझ जैसे खाने के शौकीन तो जरूर ही जानते होंगे।


जब भी हम लोग किसी भी काम से दिल्‍ली जाया करते थे तो हम चांदनी चौक जाने की पूरी कोशिश करते थे। इतना ही हम लोग सिर्फ परांठे खाने के लिए नोएडा से दिल्‍ली जाते थे। हम लोग परांठे वाली गली जाकर परांठे तो खाते ही थे साथ में रबड़ी और उसके बाद फ्रूट चाट। और लौटते हुए मंदिर से पेड़े खरीदना नहीं भूलते थे। कई बार तो हम लोगों के पास घर जाने के लिए पैसे भी नहीं बचते थे। ऐसी हालत में हम में से जिस किसी के भी एटीएम में जो थोड़े बहुत पैसे हुआ करते थे उसे हम निकालकर घर जाने का इंतजाम कर पाते थे। हालांकि कॉलेज पूरा होने के बाद फिर कभी ऐसा मौका नहीं मिला। लेकिन हां, अब भी इस तरह से जाने की इच्‍छा जरूर करती है। आखिर, परांठे वाली गली का मोह छोड़ना इतना आसान भी तो

Monday, March 31, 2008

महंगाई मार गई...

पहले कहा जाता था कि दाल रोटी खाओ प्रभु के गुन गाओ. लेकिन दिन ब दिन आस्मान छूते दाल के भाव ने आम लोगों का जीना मुहाल कर रखा है. हर आदमी मंहगाई कि मार से बदहाल है. जो मोटा चावल ८ रुपए किलो बिक रहा था, उसका दाम अब १२-१४ रुपए किलो हो गया है. यानी कि दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं. गेहूं का निर्यात करने वाला हमारा देश आयात करने पर मजबूर है. ये सब खेती के प्रति उदासीन रव्वये का ही परिणाम है. यदि समय रहते कृषि कि तरफ़ ध्यान नहीं दिया गया तो वो दिन दूर नहीं जब महंगाई के अलावा भी कई ढेर सारी समस्यायें मुह बाए खड़ी हो जायेंगे.जिसकी शुरुआत हो चुकी है. अभी तो बस रोटी, कपड़ा और मकान फ़िल्म का गाना याद आ रहा है, महंगाई मार गई...महंगाई मार गई...

Saturday, March 29, 2008

हैवानियत

पटना के गाँव नौबतपुर कि लाल परी के साथ जो कुछ भी हुआ वो इंसानियत का घिनोना चेहरा नहीं तो और क्या है. जब किसी को किसी देवता का खौफ नहीं होता तो एक आम महिला को डायन बनाने में गर्व क्यों महसूस होता है. और उसके बालों को काटकर कहते हैं कि ऐसा करने से ऐसे महिला के ऊपर से दुश्प्रवार्तियाँ चली जाती हैं. यानि कि बाल से लेकर नाखून तक सबको ऐसा पाठ पढाओ कि दुबारा डायन क्या डायन कि माँ भी आने से घबराए. ये है हमारे तताकथित सभ्य समाज की हकीक़त. वैसे ये घटना है तो गाँव की लेकिन आधुनिकता, खुलेपन और साक्षरता के दावे करने वाली संस्थाओं और ऐन्ज्यो के मुहं पर ये करारा चाट्टा ही तो है. ये कोई पहली घटना नहीं है. बिहार में पिछले १५ सालों में अब तक कुल २५०० महिलाओं को डायन बताकर मारा डाला गया है. महिला शशक्तिकरण के महीने में हुई ये घटना हमे याद दिलाती है कि मंजिल अभी दूर है.

Friday, March 28, 2008

नई शुरुआत

पहले भी एक बार ब्लॉग बना चुकी हूँ लेकिन लगातार नहीं लिख पाई. कभी समय की वजह से तो कभी अपने आलस्य के कारन. लेकिन न लिख पाने की टीस हमेशा ही रहती थे . यहाँ ये बता दूँ की मैंने भले हे न लिखा हो पर ब्लॉग में लिखी गए सामग्री को उसी तरह पढ़ती थे जैसे रोज़ अखबार को पढ़ा जाता है. बस अब मैंने भी ठान लिया कि चाहे जो कुछ भी हो जाए अब ब्लॉग की दुनिया से जाना नहीं है, क्यूंकि अपने मन की बात कहने का इससे अच्छा जरिया और क्या हो सकता है. वो कहते हैंन देर आए दुरुस्त आए .आशा है सभी ब्लोग्गेर्स का स्नेह और सहयोग मिलता रहेगा.